Wednesday, 17 December 2014

अरसा हुआ...

अरसा हुआ अब वो बारिश देखे..
न‌‍ क्षितिज  से आते काले बादल देख छत पे दौड़े ...
न बारिश की पहली बूंद को आसमान की तरफ देख महसूस किया चेहरे पे..
न बूदों से दौड़ लगायी...
न कागज की कश्ती तैरायी...
न बनियान से नाली बंद की..
न मछली बन तैरे छत पे...
न किचन बनाई गीली मिट्टी के बरतनों की..
न सुनाई कहानी इन्दर् धनुष के छूले की...
गीली मिट्टी के बरतन बनाये अब भूली बिसरी बात हुई..
अरसा हुआ अब मेरे शहर में वो बरसात हुई..

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