Sunday, 8 February 2015

जेल

आज फिर हाथ में कलम पकडी है..
आज फिर मन में एक ख्वाहिश जगी है.
आज फिर दिल ने एक सवाल किया है..
क्यों की ये गुस्ताखी तुमने?
क्यों फिर सपने सजाये हैं?
क्या अस्तित्व है आखिर इसका?
आज फिर मन चतुरता से मुस्काया है..
आज फिर स्याही कुर्बान होगी..
एक बार फिर कुछ पन्ने बरबाद होंगें...
फिर से वो अधजली मोमबत्ती जल उठेगी..
एक बार फिर शामें बरबाद होंगीं..
मेज पर रखी चाय ठंडी होगी..
देर तक निहारती रहेंगीं आँखें शरमाते क्षितिज को.. जब दिनभर का थका सूरज डूबेगा..
आखिरकार फिर पन्नों में कैद होंगी ख्वाहिशें..
फिर मन मायूश होगा..
सबकुछ वैसा ही होगा.. बस कुछ होगा तो वो होगी जेल..
कुछ निर्दोष ख्वाहिशों को।